October 2013

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सी. के. नायडू का जन्म 31 अक्टूबर, सन 1895 ई. में नागपुर में हुआ था। उनका पूरा नाम कोट्टारी कंकय्या नायडू था। सी. के. नायडू टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम के पहले कप्तान थे। सन 1932 ई. में बतौर कप्तान और क्रिकेटर  के रूप अपने पहले इंग्लैंड दौरे के दौरान वह अपनी ज़ोरदार हीटिंग के कारण काफी प्रसिद्ध हो गए थे इस दौरान उन्होंने बल्लेबाजी करते हुए 6 शतकों के साथ कुल 1618 रन बनाए तथा गेंदबाज़ी करते हुए कुल 65 विकेट हासिल किये थे। क्रिकेट की बाइबिल कही जाने वाली प्रसिद्ध पत्रिका "विजडन" ने उन्हें वर्ष 1933 में अपनी वर्ष की पाँच सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों कि सूची में शामिल किया था, इसी के साथ सी. के. नायडू "विजडन" में स्थान पाने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए। 

सन 1936 ई. में इंग्लैंड के अपने अंतिम दौरे में उन्होंने 1102 रन बनाए तथा 51 विकेट भी लिए। 1945 - 46 के सत्र में 51 वर्ष की आयु रणजी ट्रॉफी खेलते हुए होल्कर की तरफ से खेलते हुए उन्होंने बड़ोदरा के विरूद्ध 200 रन की बेहतरीन पारी खेली थी। सी. के. नायडू की योग्यता देखते हुए होल्कर महाराज ने उन्हें अपनी सेना में कैप्टन बना दिया, इसी के साथ इनका नाम कर्नल सी. के. नायडू हो गया। सी. के. नायडू ने होल्कर के अलावा आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश की टीमों की ओर से भी रणजी मैच खेले हैं। क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद सी. के. नायडू भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष तथा चयन समिति के अध्यक्ष भी रहे। क्रिकेट जगत में इनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने इन्हें सन 1955 ई. में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान "पद्मभूषण" से सम्मानित किया, वे भारत के पहले क्रिकेटर थे जिन्हें भारत सरकार से सम्मान प्राप्त हुआ था। कर्नल सी. के. नायडू का देहांत 14 नवंबर सन 1967 ई. में इंदौर, मध्य प्रदेश में हुआ था। 


सन 1932 ई. में इंग्लैंड दौरे पर जाने वाली टेस्ट मैच की प्रथम भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य खिलाड़ी। दूसरी पंक्ति में बाएं से दूसरे बैठे हुए कर्नल सी. के. नायडू। 

कुछ दिलचस्प बातें सी. के. नायडू के बारे में :-


पूरा नाम - कोट्टारी कंकय्या नायडू 
लोकप्रिय उपनाम या संबोधन - कर्नल 
खेल शैली - ऑलराउंडर , दाएं हाथ के बल्लेबाज एवं ऑफ स्पिन गेंदबाज़
पसंदीदा खिलाड़ी - विजय मर्चेंट, अमरसिंह, विजय हजारे तथा वीनू मांकड़ 
(क्रिकेट के अलावा) पसंदीदा खेल - हॉकी, बिलियडर्स, एथलेटिक्स 
अंतिम प्रथम श्रेणी मैच - 1956 - 1957 के सत्र में सी. के. नायडू ने इस मैच में 62 वर्ष कि आयु में मुंबई के विरूद्ध रणजी ट्रॉफी में 52 रन बनाए 

सन 1995 ई. में कर्नल सी. के. नायडू के जन्मशती के उपलक्ष्य में जारी डाक - टिकट 



स्वंत्रत भारत को परमाणु युग में प्रवेश दिलाने का श्रेय महान वैज्ञानिक डॉ. होमी जहाँगीर भाभा को ही जाता है। डॉ. भाभा एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में अपनी वैज्ञानिक क्षमता का परिचय दिया था।

डॉ. भाभा का जन्म बंबई (मुंबई) के एक पढ़े लिखे धनवान पारसी परिवार में 30 अक्टूबर, 1909 ई. में हुआ था। इनके पिता श्री जे. एच. भाभा बंबई (मुंबई) के सुप्रसिद्ध बैरिस्टरों में से एक थे।

डॉ. भाभा की प्रारंभिक शिक्षा बंबई (मुंबई) के केथेड्रल और जॉन कैनन हाईस्कूल में हुई। पढ़ाई में इनका काफी मन लगता था, उनकी विशेष रूचि गणित में थी, 15 वर्ष कि आयु में ही उन्होंने सीनियर कैम्ब्रिज कि परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। इसके बाद उन्हें एलफिंस्टन कॉलेज में प्रवेश दिलाया गया, वहाँ भी इन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उसके बाद इनका प्रवेश रॉयल सोसाइटी ऑफ़ साइंस में कराया गया, यहाँ अध्ययन करते हुए उन्होंने बंबई (मुंबई) विश्वविद्यालय की आई. एस. सी. की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की।

इसके बाद वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के गोनविल एंडकेयस कॉलेज में पढ़ने के लिए इंग्लैंड चले गए। वहाँ इन्होंने इंजीनियरिंग की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की. डॉ. भाभा को इंजीनियरिंग के साथ - साथ गणित और भौतिक विज्ञान में भी अत्यधिक रूचि थी। उन्होंने वही पर इन विषयों का गहन अध्ययन किया। इसी बीच हाइटर नामक वैज्ञानिक के साथ इन्हें कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ, इनके साथ रहते हुए डॉ. भाभा ने अनेक शोध कार्य किए। सन 1932 ई. में उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज में उच्च गणित का अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति मिल गई। डॉ. भाभा ने उच्च गणित के अध्ययन का कार्य समाप्त किया और 1934 से 1937 तक तीन वर्षों में भौतिक विज्ञान के संबंध में अनेक शोध कार्य किए। इस बीच इन्होंने "कॉस्मिक किरण की बौछार के क्रम प्रपात" (Cascade Theory of Cosmic Ray Showers)  सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। जिसके फलस्वरूप 1934 में उन्हें पीएचडी की उपाधि से सम्मानित किया गया।  इस प्रकार अपनी शिक्षा एवं अध्ययन समाप्त करके डॉ. भाभा भारत लौटे, भारत लौटने पर "भारत विज्ञान संस्थान, बंगलौर" में वे 1941 में भौतिकी के प्राध्यापक नियुक्त किए गए। इसके बाद उन्हें कॉस्मिक किरण संशोधन केन्द्र में प्रोफ़ेसर बनाया गया जहाँ उन्होंने तीन वर्षों तक कार्य किया। सन 1941 ई. में उन्हें "रॉयल सोसाइटी" का फैलो बनाया गया, जिसके लिए उन्हें लंदन जाना पड़ा। सन 1942 ई. में उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के "एडम्स पुरस्कार" से भी सम्मानित किया गया।

डॉ. भाभा ने विज्ञान में भौतिक अनुसंधान हेतु एक संस्थान का निर्माण करने के उद्देश्य से दोराबजी टाटा ट्रस्ट को एक पत्र लिखा। उनके अनुरोध पर दोराबजी टाटा ट्रस्ट द्वारा टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च नामक संस्था की स्थापना की गई। जिसके वे प्रथम निदेशक बने। इस हेतु डॉ. भाभा ने बंगलौर छोड़ दिया और मुंबई चले आए।

भारत कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन 1948 ई. में "परमाणु शक्ति आयोग" की स्थापना कि गई। डॉ. भाभा को इस आयोग का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। डॉ. भाभा ने अपनी अध्यक्षता में प्रथम परमाणु शक्ति से सम्बंधित कार्य ट्रॉम्बे में अप्रैल सन 1955 ई. में आरम्भ किया।  ट्रॉम्बे का परमाणु - शक्ति केन्द्र उनकी एक महान कृति है। इस केन्द्र का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। डॉ. भाभा ने अपने कार्यकाल में "अप्सरा" तथा "जरलीना" नामक परमाणु भट्टियों का निर्माण कराया। डॉ. भाभा के उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने परमाणु ऊर्जा संस्थान, ट्रॉम्बे (AEET) को डॉ. भाभा के नाम पर "भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र" रख दिया।

24 फरवरी सन 1966 ई. को जब वे "कंचन जंघा" नामक विमान द्वारा मुंबई से जेनेवा जा रहे थे, तभी ये विमान पश्चिमी यूरोप की सबसे ऊँची चोटी "माउंट ब्लैक" (फ्रांस) से टकराकर नष्ट हो गया और विज्ञान जगत का यह सितारा सदा के लिए हम सबसे अलविदा कह गया।    


आप सबने गूगल के 'प्रोजेक्ट लून' के बारे में सुना ही होगा, अगर नहीं तो यहाँ चटका लगा के इसके बारे में विस्तार से पढ़ लीजिए। 

गूगल के 'प्रोजेक्ट लून' से मैं खासा प्रभावित हूँ, आप सबने अधिकतर देखा ही होगा जब कही पर प्राकृतिक आपदा आती है जैसे :- सुनामी, बाढ़, भूकंप आदि तब अधिकतर ऐसी जगहों में फँसे लोगों से संपर्क टूट जाता है। ऐसी स्थिति में जब तक वहाँ राहत या मदद नहीं पहुँचती तब तक वहाँ फँसे लोगों से किसी का भी संपर्क नहीं हो पता है, लेकिन अगर हम 'प्रोजेक्ट लून' जैसी सेवाओं की मदद ले तो काफी हद तक ये संभव है कि हमारा वहाँ आपदा में फँसे लोगों से सीधा संपर्क हो सकता है। 

जैसे 'प्रोजेक्ट लून' इंटरनेट की सुविधा मुहैया कराता है ठीक उसी तरह इसी तरह के गुब्बारे या बैलून हम आसमान में छोड़कर फ़ोन करने कि सुविधा लोगों तक पहुँचा सकते है। इसी तरह हम दूर - दराज तक फैले पहाड़ी इलाकों में फ़ोन करने और इंटरनेट की आधुनिक सुविधा मुहैया करा सकते है। इससे कई सरकारी और गैर सरकारी कंपनियों का काफी पैसा बच जायेगा जो, वो मोबाइल टॉवर लगाने में लगा देते हैं। इससे पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा और संचार क्रांति का काफी विकास होगा। भारत की केंद्र और राज्य सरकारों को 'प्रोजेक्ट लून' से कुछ सीखना चाहिए, अभी हाल ही घटित उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा से सरकार को सबक लेना चाहिए और इस विषय पर गंभीरता से सोचना चाहिए।

किसी कवि ने सच ही कहा है कि "राजपूताने की मिट्टी खून से सनी हुई होने के कारण लाल है।" यहाँ के लोगों ने, स्त्रियों और पुरुषों ने इतने बलिदान दिए हैं कि भूमि का कोई भी कोना उस बलिदान से अछूता नहीं रहा है। 

चित्र साभार : www.gyandarpan.com  
इसी राजस्थान में चित्तौड़ के राजा राणा लक्ष्मण सिंह थे। उन्हें रतन सिंह नाम से भी पुकारा गया है। उनकी रानी पद्मिनी अद्वितीय सुंदरी थी। उसके रूप और सौन्दर्य की चर्चा दूर - दूर तक फ़ैल चुकी थी। दिल्ली के बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी के कानों में भी उनकी सुंदरता और गुणों की चर्चा सुनाई पड़ी। 

वह उसे पाने को आतुर हो उठा। उसने विशाल सेना लेकर चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई शुरू कर दी। वह किसी भी कीमत पर पद्मिनी को अपनी रानी बनाना चाहता था, पर जब बल से उसकी दाल न गली तो उसने छल का सहारा लेकर राजा लक्ष्मण सिंह को बंदी बना लिया।

महारानी पद्मिनी ने गोरा और बादल के साथ मिलकर राजा को अल्लाउद्दीन के कब्जे से छुड़ाने के लिए एक योजना बनाई। योजनानुसार पद्मिनी ने अल्लाउद्दीन को कहला भेजा कि वह उससे मिलने आ रही हैं। इधर डोलियों में एक - एक योद्धा सज कर बैठा। कहार बने वीर सैनिक। डोलियों को देखकर अल्लाउद्दीन ख़ुशी से नाचने लगा। वह पद्मिनी का स्वप्न देखने लगा।

इधर गोरा अल्लाउद्दीन के पास जाकर बोला, "लोक सुंदरी हमारी महारानी पल भर के लिए अपने पति लक्ष्मण सिंह से मिलना चाहती हैं।" अपने अधपके बालों को सहलाते हुए अल्लाउद्दीन ने कहा, "मुझे तुम्हारी बात और प्यारी की इच्छा दोनों मंज़ूर हैं।" लक्ष्मण सिंह को छोड़ दिया गया। योजनानुसार पद्मिनी और राजा लक्ष्मण सिंह वहां से सुरक्षित निकल गए।

वहाँ भयंकर मार काट मच गई, गोरा मारा गया और अल्लाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ी कहारों से अपमानित और पराजित हुआ। अल्लाउद्दीन अपने इस अपमान का बदला लेने और पद्मिनी को पाने पुन: एक बहुत विशाल सेना लेकर चित्तौड़गढ़ पर हमला करने आया।

अल्लाउद्दीन बड़ा रूप लालची दानव था। उसके फाटक पर खून चूते हुए कटे सिर टंगे रहते थे। तड़प कर मरते हुए मनुष्यों को देख कर वह बहुत खुश होता था। उसने आदेश दिया था कि जो सैनिक वापिस हारकर लौटेगा तो वो उसकी बोटी - बोटी काट कर कुत्तों के सामने डाल देगा।

उधर राजपूत भी चौकन्ने थे। राजपूतों ने युद्ध में बड़ी वीरता दिखाई। कई बार शत्रुओं के दाँत खट्टे किये उन्हें पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा, पर शत्रु सेना अनगिनत थी। घमासान युद्ध कई दिन तक चला। उधर राजा लक्ष्मण सिंह को स्वप्न में देवी ने प्रकट होकर कहा, "मैं भूखी हूँ, मुझे राजरक्त चाहिए।"

प्रात:काल राजा लक्ष्मण सिंह ने अपने सभी पुत्रों और सरदारों को अपना स्वप्न बताया। सभी रण के लिए उतावले बैठे थे। इधर पुरुषों ने केसरिया बाना धारण किया उधर क्षत्राणियों ने जौहर की तैयारी की। हाथों में नंगी तलवारें लेकर राजपूत शत्रु सेना पर टूट पड़े और गाज़र मूली की तरह उसे काटने लगे। अंत में राजा लक्ष्मण सिंह के स्वाहा हो जाने का समाचार सुन राजपूत रमणियाँ श्रृंगार कर जली चिता में कूदने लगी। स्वाहा-स्वाहा का स्वर ही बस सुनाई दे रहा था।

चित्र साभार : bharatdiscovery.org 
इधर राजपूत अपनी बलि दे रहे थे, उधर कुल वधुएँ माता पार्वती के समक्ष यह कहकर - "माँ दक्षयज्ञ के कुंड में जैसे आप कूदी थीं हमें भी वही शक्ति दो।" धधकती चिता में कूद-कूद कर अपनी आहुति दे रही थीं। जब तक एक भी राजपूत बचा वह युद्ध करता रहा है।

कहा जाता है कि अल्लाउद्दीन जब महारानी पद्मिनी को खोजते हुए चित्तौड़गढ़ में घुसा तो उसके हाथ के भाले में राजा लक्ष्मण सिंह का का कटा सिर टंगा था। चिता की लपटों में उसे पद्मिनी की छाया दिखाई दी। भय से लक्ष्मण सिंह का सिर भाले सहित उसके हाथ से छूट कर आग में जा गिरा। अल्लाउद्दीन खिलजी पागलों की तरह चिल्लाता हुआ दिल्ली लौट आया और कुछ समय बाद उसी गम में मर गया।

महारानी पद्मिनी का बलिदान इतिहास में सदैव के लिए अमर हो गया।



साभार : स्वदेश संस्कृति किताब से 
मेरे द्वारा पढ़ी गयी कहानियों में से एक


आज अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस (International Poverty Eradication Day) है। यह महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय दिवस प्रत्येक वर्ष 17 अक्टूबर को दुनिया भर में मनाया जाता है। दुनिया भर में तेज़ी से फ़ैल रही इस गरीबी से लड़ने और उसके निवारण के लिए ही संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) ने आधिकारिक रूप से सन 1992 ई. में गरीबी उन्मूलन के लिए प्रत्येक वर्ष 17 अक्टूबर को अंतराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस मनाने की सार्वजनिक घोषणा की।

गरीबी हमेशा से मानव के लिए अभिशाप रही है। गरीबी और उससे होने वाले नुकसान हमेशा से मनुष्य जाति के लिए एक चिंताजनक विषय रहे है जिसका निवारण शायद आज वर्तमान में भी नहीं है, लेकिन हम इस अभिशाप को कुछ हद तक तो कम कर ही सकते हैं। गरीबी कई समस्याओं की जननी है जैसे :- अशिक्षा, निम्न स्तरीय जीवन, भुखमरी और सामाजिक अवहेलना आदि। गरीबी को दूर करने के लिए आज से नहीं कई वर्षों से तमाम लोगों ने इसे दूर करने की कोशिश की है जो अभी तक विफल ही साबित हुई है। वर्तमान समय में कई देशों की और राज्यों की सरकारों ने आम लोगों की गरीबी दूर करने के लिए कदम तो उठाए है लेकिन मात्र अपने राजनीतिक फायदे के लिए। इसलिए गरीबी को दूर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने कई कठोर कदम उठाये हैं, जिनमें सर्वप्रमुख है "END POVERTY 2015" जिसमें संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2015 तक गरीबी को दूर करने का परम लक्ष्य रखा है। 


आज भारत के महान गाँधीवादी नेता श्री लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी का 111 वां जन्म दिवस है। जयप्रकाश जी उर्फ़ जेपी को याद किया जाता है तो वह है उनके द्वारा आंदोलित "संपूर्ण क्रांति" (Total Revolution)। अपने जीवन के लम्बे समय में लोकतंत्र की कमियों को आलोचना करते - करते थक गए। सरकार की भी नीतियों में कोई खास परिवर्तन नहीं आया जिसके चलते भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, गरीबी और सत्ता केन्द्रीकरण निरंतर बढ़ती ही चली गई। जिससे जेपी ने अपने जीवन के अंतिम दशक में यह अनुभव किया कि भारत की ये समस्याएं विकराल रूप धारण कर चुकी है, जिसका एक मात्र उपाय है "संपूर्ण क्रांति"।

जेपी ने 5 जून, सन 1975 ई. में पटना के गाँधी मैदान में छात्रों और युवाओं की एक बड़ी रैली में एक आन्दोलन की शुरुआत की थी और उसे नाम दिया गया था, "संपूर्ण क्रांति"। हालाँकि जेपी ने सक्रिय राजनीति से 1957 ई. में ही किनारा कर लिया था। मगर जनता से जुड़े मुद्दों से उन्होंने कभी किनारा नहीं किया था। उनकी "संपूर्ण क्रांति" से इंदिरा गाँधी की सत्ता को झटके लगने लगे। इसलिए इंदिरा गाँधी ने 25 जून, सन 1975 ई. की आधी रात को देश में आपातकाल लगा दिया और जेपी समेत कई विपक्षी नेताओं को जेल भेजवा दिया। 

18 जनवरी, सन 1977 को आपातकाल हटाया गया और देश में चुनाव की घोषणा हुई।  इस चुनाव में जेपी की पहल पर गठित जनता पार्टी को जोरदार सफलता मिली और देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। 

"संपूर्ण क्रांति" में आम लोगों की भागीदारी को देखकर ही उस वक़्त राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने लिखा कि - "  सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। "
   

भारत सरकार द्वारा सन 1980 ई. में जयप्रकाश नारायण जी के ऊपर जारी किया गया डाक टिकट


भारत सरकार द्वारा न 2001 ई. में जयप्रकाश नारायण जी के ऊपर जारी किया गया डाक टिकट


सन 2002 ई. में जयप्रकाश नारायण जी की जन्मशती पर जारी किये गए दुर्लभ सिक्के 



आज जयप्रकाश नारायण जी के जन्म दिवस पर हम सब उन्हें नमन करतें हैं।। 


विश्व डाक दिवस (World Post Day) प्रत्येक वर्ष 9 अक्टूबर को मनाया जाता है। विश्व के सभी देशों के बीच पत्रों और संदेशों का आवागमन तेज़ी और सहज रूप से हो सके इसलिए 9 अक्टूबर, सन 1874 ई. जनरल पोस्टल यूनियन के गठन के हेतु बर्न, स्विटज़रलैंड में विश्व के 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किये थे। इसी कि याद में 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1 अप्रैल, सन 1879 ई. में जनरल पोस्टल यूनियन का नाम परिवर्तित करके युनिवर्सल पोस्टल यूनियन (Universal Postal Union) कर दिया गया था।

वैसे विश्व डाक दिवस का मुख्य उद्देश्य अपने ग्राहकों को डाक विभाग के प्रति जागरूक करना और उन्हें डाक विभाग के सेवाओं की जानकारी देना है। इसी वजह से 9 अक्टूबर से 14 अक्टूबर तक विश्व डाक सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। 10 अक्टूबर को बचत बैंक दिवस, 11 अक्टूबर को मेल(पत्र) दिवस, 12 अक्टूबर को डाक टिकट संग्रह दिवस, 13 अक्टूबर को व्यापार दिवस और 14 अक्टूबर को बीमा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 चित्र साभार : गूगल 
1857 ई. में हांगकांग में बने इस "रेड रेवेन्यू स्टांप" को गौर से देखेंगें, तो आप पाएंगे कि यह पहले 3 सेंट का स्टांप था। जिसके ऊपर 1 डॉलर छापा गया है या छप गया है। अपनी इस खूबी के कारण यह स्टांप दुर्लभ हो गया है और वर्ष 2009 ई. में एक नीलामी में लाखों डॉलर में बिका। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस तरह के कुल 32 स्टांप की प्रतियाँ ही छापी गयी थी जिनमें से ये एक है। 

स्टांप पर यह गलती से छपा या इसका कुछ और कारण था, ये तो बनाने वाला ही जाने पर बेचने वाले को तो ये अच्छी खासी रकम दिला गया। 

Keywords :- China Rare and Unique Post Stamp Red Revenue stamp

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